जीवन की घटनाएं~
इस जीवन की लगभग सभी घटनाएँ पहले से तय होती है । और जन्म लेने से पुर्व आत्मा स्वयं अपने जीवन का चुनाव करती है सूक्ष्म लोक में । और वहाँ पर हमारे स्पिरिट गाईड भी मौजूद होते है वो हमारी सहायता करते है ।
कौनसी घटना को चुनना है इसमें वहाँ मौजूद आत्माएँ हमारी सहायता करती है ।
पदचिन्ह 🐾
पृथ्वीलोक पर आने से पुर्व हर एक आत्मा को उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाता है । परंतु 5 वर्ष के होने के पश्चात सब धुंधला होता जाता है । जिससे हमारी स्मृति उसे कम कर देती है धीरे धीरे हम उस लक्ष्य को भूल जाते है ।
इस कारण हम हमेशा जीवन में असन्तुष्ट रहते है घर परिवार में रहते हूए भी कुछ कमी खलती रह्ती है वो उसी लक्ष्य से दुर होने के कारण होता है ।
और देखते ही देखते फिर शरीर मृत्यू का समय भी आ जाता है और लक्ष्य अधूरा रह जाता है सब व्यर्थ हो जाता है सूक्ष्म लोक में हम पास नहीं हो पाते । हमें फिर से वही लक्ष्य लेकर जमीन पर आना होता है और वही दोहराना पड़ता है ।
जीवन में लक्ष्य से दुर होने पर हमारे स्पिरिट गाइड हमारी मदद करते है हमें पहचान चिन्ह देते है हमसे कनेक्ट होने की कोशिश करते है ।
पर हम यहाँ इतने खो जाते है की हम उन्हे देख नही पाते ।
जिस प्रकार धरती पर हमारा परिवार होता है उसी प्रकार आत्मलोक में भी हमारा परिवार होता है । हमारे प्रियजन होते है ।
और असल बात तो ये है की वो ही हमारे आत्मिक संगी होते है । धरती पर तो भौतिक परिवार होता है । और ऐसा बहुत कम ही होता है की धरती पर भी हमारा कोई आत्मिक साथी हो ।
क्योकिं यहाँ तो हम अपने कर्म काटने आये है कर्म पुर्ण करके हमें वापस वहीं जाना है ।
धरती पर रहने वाले हमारे आत्मिक साथी अध्यात्मिक हो सकते है ।
वो यहाँ रहकर भी हमें वहां का ज्ञान देते है हमारे लक्ष्य से हमें भटकने नहीं देते है । बहुत भाग्यशाली होते है वो जिनको धरती पर आत्मिक साथी मिलते है । उनकी फिर बहुत उन्नति होती है । इस लोक में भी और परलोक में भी ।
अब आप कहेंगे की अगर हम खुद जीवन की घटनाएँ तय करते है तो क्या जीवन में आने वाले इतने दुख हमनें चुने थे ?
हम भला ऐसा दुख भरा जीवन अपने लिये क्यों चुनेंगे?
पर सच यही है कितने ही कष्ट आये हो जीवन में सभी हमनें ही चुने थे ।
क्योकिं जब हम आत्मलोक में होते है तब हम भौतिक शरीर से नहीं जुड़े होते है । इस कारण हम वहाँ पूर्ण शुद्ध होते है । वहाँ हम खुद ही अपने किये कर्मो की सजा पाने की मांग करते है । वहाँ कष्ट का अनुभव नहीं होता है बल्कि खुशी होती है ।
कर्म बन्धन से मुक्त होने से बड़ी कोई खुशी नहीं होती । आत्मलोक में हम जल्दी से हल्के होकर और उपर के लोकों में जाने के लिये तत्पर रहते है ।
धरती पर जन्म लेना और कष्ट चुनने का ये फायदा होता है की हम एक ही जन्म में कई जन्मों को पार को कर सकते है क्योकिं यहाँ हमें दूसरें लोक के बारे में कुछ याद नहीं रह्ता है । तब हम जल्दी जल्दी लक्ष्य की ओर बढ़ते है चाहे हमें भौतिक रुप से इसका एहसास हो या ना हो ।
आत्मलोक में रहने वाली आत्माएँ धीरे धीरे उन्नति करती है गति बहुत धीमी होती है उनकी क्योकिं वहाँ सभी आत्माएँ प्रेमपूर्ण होती है आपस में एक दूसरें के लिये अच्छी भावनाएँ रखती है चाहकर भी बुरा नहीं कर पाती और उन्हें तो वहाँ एसे विचार भी नहीं आते ।
क्योकिं वहाँ का जीवन इस मृत्यलोक के मुकाबले बहुत सुन्दर होता है वहां कोई संघर्ष नहीं होता । होता है तो बस आपसी प्रेम ।
सब अपने में ही ध्यान मगन रहते है। कोई किसी से हस्तक्षेप नहीं करता । वहाँ आत्मा इच्छा मात्र से ही भोजन करती है । भोजन भौतिक नहीं होता है ऊर्जा होती है ।
वहाँ सब ऊर्जा ही ऊर्जा होती है । ऊर्जा ही कार्य करती है । बिना शब्दों के ऊर्जा के माध्यम से आत्मा दुसरी आत्मा से सम्बंध स्थपित करती है । वो जीवन अलौकिक होता है इसलिये कोई भी आत्मा उस जीवन को छोड़कर यहाँ आने के लिये तेयार नहीं होती है ।
परंतु एक आत्मा की यात्रा तो जन्म जनमान्तर की होती है उसके सूक्ष्म शरीर में सभी संचित कर्म जमा होते है जिसे निकालने के लिये उसे पृथ्वी पर आना पड़ता है ।
सब कर्मों का ही खेल है इसलिये कहते है कर्म अच्छे करने चाहिये क्योकिं वो ना सिर्फ इस लोक को बल्कि परलोक को भी सुधार देते है ।
बन्धन क्या है ?
बन्धन का सही अर्थ है "कर्म "
ये स्थुल शरीर भी एक बन्धन है जो कर्म से निर्मित हुआ है ।
ये शरीर तभी तक जीवित रह सकता है जब तक इसके संचित और प्रारब्ध के कर्म शेष है ।
ये संचित और प्रारब्ध के कर्म हमारे सूक्ष्म और कारण शरीर मे विद्यमान होते है ।
जो परिस्थियों के रुप में हमारे सामने आते है । जेसे ही हम उन कर्मो को काट लेते है हम उनसे मुक्त हो जाते है ।
हमारे ये कर्म एक जन्म के नहीं है । बल्कि कई जन्मों के होते है जिसे संचित कर्म कहते है ।
हम इस पृथ्वीलोक पहले भी बहुत से जन्म ले चुके हैं। उसी कारणवश और उसी आधार पर हमारा फिर से यहां जन्म हुआ है ।
तीन तरह है कर्म होते है जो तीन तरह के शरीरों का निर्माण करते है
प्रारब्ध ,संचित और क्रियमाण ।
तीन शरीर - स्थुल ,सूक्ष्म और कारण ।
इन्हीं तिनों शरीरों में आत्मा की यात्रा चलती है ।
तीनों शरीरों और कर्मो के आधार पर आत्मा को अलग अलग लोक में उसकी योग्यता अनुसार जीवन प्राप्त होता है ।
जब हम तिनों से उपर उठ जाते है तब हमें अपने आत्मस्वरुप का ज्ञान होने लगता है ।
जो इस मार्ग पर चलता है साधना की उच्चता के कारण उसके कर्म जल्दी कटने लगते है और एक के बाद एक दुख या सुख के रुप में सामने आने लगते है ।
जो कर्म हम पहले कर चुके है उसपर अब हमारा कोई वश नहीं इसलिये पृथ्वी पर जो हमें परोसा जा रहा है उसे हम नहीं बदल सकते ।
लेकिन हमारे जो क्रियमाण कर्म है वो हमारे पुराने कर्मो को दबाने और नष्ट करने की ताकत रखते है ।
आज चारों ओर हर मनुष्य पीड़ित नजर आता है त्राहि त्राहि मालुम पड़ता है । कोई संतुष्ट नहीं है।
जब एक बच्चा मेले में जाता है मनोरंजन के लिये और अगर वहीं गुम हो जाये तो उसके माता पिता को कैसा लगता है ? कुछ एसा ही हमारे परमपिता परमात्मा को लगता है जब हम धरती पर खो जाते है ।
आत्मा का मूल स्वभाव है स्वतंत्रता ,मुक्ति वो उसी की खोज में है ।
वो किसी के अधीन नहीं रह सकती है । परंतु कर्मो उसे बन्धन का एहसास होता है । वो अपने मूल स्वरुप में तो हमेशा ही मुक्त है ।
पर शरीर से जुड़े होने के कारण उसे अकारण ही एसा प्रतीत होता है कि कोई बन्धन है ।🙏
- एक और कंडिशन होती है जब किसी आत्मा को धरती पर जन्म लेना पड़ता है जब धरती पर अधर्म बढ गया हो । मनुष्य पशुओं की तरह बर्ताव करने लग गये हो तब उस अवस्था में परमात्मा स्वयं अपने अंश को धरती पर भेजते है
सभी दूसरें जीवों का उद्धार करने और उन्हें उनकी पहचान करवाने के लिये । क्योकिं होते तो सभी परमात्मा को प्रिय है । पर सबकी गति बदल जाती है । मतलब रास्ता भटक जाना । वो ही महान आत्मा को ये कार्य दिया जाता है भटके हूए को रास्ता दिखाने का ।
पर वो कोई लाखों में एक ही होता है विरला जिसे ये जिम्मेदारी दी जाती है । जैसे कोई सच्चे अध्यात्मिक गुरु जो करोडों लोगों को फिर इस मार्ग पर लेकर चल सकते है ।
जय गुरुदेव 🙏
ममता सीरवी ~
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